भदोही। किसानों की आय दोगुनी होगी। उन्हें खेती करने से लेकर अपने उत्पाद को बेचने में किसी तरह की दिक्कत न आने पाए हर संभव सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी लेकिन कैसे! यह सवाल हर जेहन से गायब है। गेहूं व धान की उपज को छोड़ दिया जाय तो शित अपनी हाड़-तोड़ मेहनत के जरिए जिले की 19 लाख आबादी का पेट भरने वाले ढाई लाख अन्नदाता अपनी उपज को कहां ले जाएं, जिससे उन्हें वाजिब कीमत हासिल हो सके अनसुलझी पहले बनी है। आज जबकि लोकसभा चुनाव को लेकर चल रहे महासमर में बड़े-बड़े वादे हो रहे हैंइस दौर में भी शायद इसका जवाब किसी के पास नहीं है कि आज तक किसानों के लिए एक बाजार की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी है। नतीजा किसानों के सामने अपने उत्पाद को औने-पौने दाम में बेचने की विवशताइतनी बड़ी समस्या किसी भी दल व प्रत्याशी के लिए मुद्दा बनते नहीं दिख रहा है ।गेहूं व धान के उपज की खरीद के लिए भले ही क्रय केंद्र स्थापित किए जाते हों लेकिन सब्जियों से लेकर अन्य अन्य उत्पाद की बिक्री के लिए आज तक जिले में कोई बाजार नहीं तैयार हो सका है। न ही कोई ऐसी व्यवस्था है कि किसान अपने कच्चे उत्पाद को कुछ समय तक सुरक्षित रख सकें। ऐसे में किसान विशेषकर न हाथों औने-पौने दाम में देने को मजबर हो जाते हैं ।वर्ष 1971 में ट्रायल सीजन न के साथ चालू हुई औराई चीनी मिल मिल जनवरी 2005 तक पूर्ण रूप से चल नल कर बंद हो गई। इसी के साथ गन्ने की भी भी गायब हो गई। औराई चीनी मिल स्थापना के बाद जिले सहित आस-पास के मीरजापुर, जौनपुर, वाराणसी, चंदौली से लेकर अन्य कई जनपदों में गन्ने की खेती वृहद पैमाने पर होती थी। सुरक्षित क्षेत्र में पेराई के लिए 40 लाख कुंतल गन्ने की उपलब्धता होती है। किसान मिल को गन्ना देकर लाभ हासिल किया करते थे। साथ ही लाभ हासिल किया करते थे। साथ ही मिल से सीजनल व परमानेंट मिलाकर कुल 400 कर्मचारी काम करते थे। मिल बंद होने के साथ गन्ने की खेती का दायरा भी सिमट गया। मिल संचालन को आज तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। दुग्ध उत्पादन कर आर्थिक स्थिति को मजबूत करने को शासन की संचालित कामधेनु व मिनी कामधेनु योजना के तहत पशुपालकों ने डेयरी स्थापित कराने में रुचि तो दिखाई जरूर लेकिन उत्पादित दूध की बिक्री के लिए बाजार की सुलभता न होना सबसे बड़ी र बाधा बनी है। जिले में 3.54 लाख में दुधारू गाय-भैंस से मिलाकर प्रति दिन : ढाई लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है। जिसे सुरक्षित रखने के लिए एक चिलिग प्लांट की स्थापना नहीं हो सकी है। डेयरी संचालकों का कहना है कि शासन ने योजना तो संचालित कर दी र सो लेकिन कोई ऐसी व्यवस्था नहीं दी जहां वे अपने दग्ध उत्पादन को बेच सकें।
किसानों की आय कब होगी दोगनी?